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    नीट पीजी 2026: एमडी पैथोलॉजी की दौड़ में कौन आगे, कौन पीछे? पूरे भारत के क्लोजिंग रैंक का गहन विश्लेषण
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    नीट पीजी 2026: एमडी पैथोलॉजी की दौड़ में कौन आगे, कौन पीछे? पूरे भारत के क्लोजिंग रैंक का गहन विश्लेषण

    Himanshu PriyadarshiUpdated on 07 Sep 2026, 05:43 PM IST

    नीट पीजी की काउंसलिंग को लेकर हर साल लाखों एमबीबीएस स्नातकों की धड़कनें तेज़ हो जाती हैं, और एमडी पैथोलॉजी जैसे लोकप्रिय क्लीनिकल-लैब कोर्स को लेकर यह बेचैनी और भी ज्यादा रहती है। ऑल इंडिया कोटे के ताज़ा डेटा के Careers360 के विश्लेषण में यह साफ झलकता है कि पैथोलॉजी की सीटें पाने के लिए छात्रों को किस स्तर की प्रतिस्पर्धा से गुज़रना पड़ता है- देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों में जहां चंद हज़ार की रैंक पर भी सीट फिसल जाती है, वहीं कुछ कॉलेजों में लाख से ऊपर रैंक पर भी दाखिला संभव हो पाता है।

    This Story also Contains

    1. नीट पीजी 2026: एक साल में सीटों में जबरदस्त उछाल
    2. जनरल कैटेगरी: टॉप 15 कॉलेज, जहां सबसे कम रैंक पर भी सीट पक्की नहीं
    3. रैंक का दायरा: 13 हज़ार से लेकर सवा लाख तक का फासला
    4. क्षेत्रीय रुझान: दक्षिण और उत्तर भारत के संस्थानों का दबदबा
    5. उम्मीदवारों के लिए क्या सीख?
    नीट पीजी 2026: एमडी पैथोलॉजी की दौड़ में कौन आगे, कौन पीछे? पूरे भारत के क्लोजिंग रैंक का गहन विश्लेषण
    नीट पीजी 2026: एमडी पैथोलॉजी की दौड़ में कौन आगे, कौन पीछे? पूरे भारत के क्लोजिंग रैंक का गहन विश्लेषण

    नीट पीजी 2026: एक साल में सीटों में जबरदस्त उछाल

    देशभर में पीजी मेडिकल सीटों की कुल संख्या में साल दर साल इज़ाफा हो रहा है, जो एमडी पैथोलॉजी के इच्छुक छात्रों के लिए भी एक सकारात्मक संकेत है।

    कोर्स प्रकार

    कुल सीटें 2024

    कुल सीटें 2025

    एमडी

    33,836

    39,559

    एमएस

    15,770

    18,414

    डिप्लोमा

    370

    370

    एमडी/एमएस (संयुक्त)

    0

    57

    कुल योग

    49,976

    58,400

    यानी महज एक साल में कुल सीटों की संख्या में करीब साढ़े आठ हज़ार का इज़ाफा हुआ है, जिसमें एमडी सीटों की बढ़त सबसे ज्यादा रही। इसका सीधा असर आगे चलकर पैथोलॉजी जैसे विषयों की उपलब्धता और प्रतिस्पर्धा पर भी पड़ता है।

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    जनरल कैटेगरी: टॉप 15 कॉलेज, जहां सबसे कम रैंक पर भी सीट पक्की नहीं

    ऑल इंडिया कोटे के आंकड़ों के मुताबिक, जनरल कैटेगरी में सबसे कम (यानी सबसे बेहतर) क्लोजिंग रैंक वाले संस्थानों की सूची इस तरह है- इन कॉलेजों में दाखिला पाना सबसे मुश्किल माना जाता है, क्योंकि इनकी सीटें बेहद कम रैंक पर ही भर जाती हैं।

    कॉलेज का नाम

    जनरल क्लोजिंग रैंक

    गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, कोट्टायम

    13,162

    अटल बिहारी वाजपेयी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड डॉ. राम मनोहर लोहिया हॉस्पिटल, नई दिल्ली

    15,391

    निज़ाम्स इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, हैदराबाद

    15,736

    गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, कोझिकोड

    18,669

    टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल, मुंबई

    19,150

    मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज, नई दिल्ली

    19,409

    सेठ गोरधनदास सुंदरदास मेडिकल कॉलेज एंड केईएम हॉस्पिटल, मुंबई

    20,048

    एससीबी मेडिकल कॉलेज, कटक

    20,205

    शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, श्रीनगर

    20,283

    ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज, बेंगलुरु

    20,869

    वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज एंड सफदरजंग हॉस्पिटल, नई दिल्ली

    21,900

    मद्रास मेडिकल कॉलेज, चेन्नई

    22,225

    गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, चंडीगढ़

    23,069

    गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, श्रीनगर, कश्मीर

    23,136

    संजय गांधी पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, लखनऊ

    23,964

    Careers360 के विश्लेषण के मुताबिक, गौर करने वाली बात यह है कि इस टॉप-15 सूची में केरल, दिल्ली, तेलंगाना, ओडिशा, जम्मू-कश्मीर और महाराष्ट्र के संस्थान शामिल हैं, जो दिखाता है कि पैथोलॉजी की मांग किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे देश में समान रूप से फैली हुई है। दिलचस्प यह भी है कि टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल और सेठ जीएस मेडिकल कॉलेज-केईएम जैसे कैंसर व सुपर-स्पेशियलिटी अनुसंधान से जुड़े संस्थान इस सूची में मौजूद हैं, जो शोध-उन्मुख छात्रों के बीच पैथोलॉजी की बढ़ती लोकप्रियता की झलक देते हैं।



    रैंक का दायरा: 13 हज़ार से लेकर सवा लाख तक का फासला

    पूरे डेटा सेट पर नज़र डालें तो जनरल कैटेगरी की क्लोजिंग रैंक 13,162 से शुरू होकर करीब 57,600 तक जाती है, जबकि ओबीसी, एससी और एसटी जैसी आरक्षित श्रेणियों में यह आंकड़ा कई कॉलेजों में एक लाख से भी ऊपर पहुंच जाता है- कुछ मामलों में तो यह 1,34,000 के आसपास तक दर्ज है। यानी आरक्षित श्रेणी के छात्रों के लिए दाखिले का दायरा कहीं अधिक व्यापक है, जो एक तरह से इन श्रेणियों में मौजूद सीटों की संख्या और मांग-आपूर्ति के संतुलन को भी दर्शाता है।

    वहीं कई प्रतिष्ठित संस्थानों (जैसे टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल मुंबई, ईएसआईसी फरीदाबाद, आरयूएचएस जयपुर, नॉर्दर्न रेलवे सेंट्रल हॉस्पिटल दिल्ली) में कुछ आरक्षित श्रेणियों की सीटें या तो जनरल मेरिट से ही भर गईं, या डेटा में उपलब्ध नहीं दिखतीं, जो यह संकेत देता है कि इन कॉलेजों की मांग जनरल कैटेगरी के भीतर ही इतनी ज्यादा रही कि आरक्षित सीटों की अलग गणना जटिल हो गई।

    क्षेत्रीय रुझान: दक्षिण और उत्तर भारत के संस्थानों का दबदबा

    आंकड़ों को गौर से देखने पर एक स्पष्ट पैटर्न उभरता है-

    • केरल के सरकारी मेडिकल कॉलेज (कोट्टायम, कोझिकोड, तिरुवनंतपुरम, त्रिशूर) लगातार निचली (यानी बेहतर) रैंक रेंज में बने हुए हैं, जो राज्य की मज़बूत स्वास्थ्य शिक्षा व्यवस्था और सीमित लेकिन गुणवत्तापूर्ण सीटों का नतीजा माना जा सकता है।

    • दिल्ली और उत्तर भारत के मौलाना आज़ाद, वीएमएमसी-सफदरजंग, यूसीएमएस जैसे संस्थान भी टॉप रेंज में शामिल हैं, जो राष्ट्रीय राजधानी की स्वाभाविक प्राथमिकता को दर्शाता है।

    • वहीं पूर्वोत्तर और नए स्थापित मेडिकल कॉलेजों (जैसे नए स्वायत्त राज्य मेडिकल कॉलेज, कुछ ईएसआईसी और राज्य-स्तरीय संस्थान) में क्लोजिंग रैंक अपेक्षाकृत ऊंची रही, जो इन संस्थानों के अपेक्षाकृत नए होने और सीमित इंफ्रास्ट्रक्चर की धारणा से जुड़ा हो सकता है।

    उम्मीदवारों के लिए क्या सीख?

    Careers360 के विश्लेषण से एक बात साफ है कि एमडी पैथोलॉजी जैसे विषय में सीट पक्की करने के लिए सिर्फ अच्छी रैंक ही काफी नहीं, बल्कि सही रणनीति और कॉलेज चयन भी उतना ही अहम है। जो छात्र टॉप 15-20 संस्थानों की दौड़ में नहीं आ पाते, उनके लिए भी देशभर में सैकड़ों विकल्प मौजूद हैं, जहां व्यापक रैंक रेंज में दाखिला संभव है। काउंसलिंग के दौरान श्रेणी-वार कटऑफ, पिछले वर्षों के रुझान और कॉलेज की इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी बातों को ध्यान में रखकर ही अंतिम फैसला लेना बेहतर रहेगा।

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