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हर घोषित किए जाने वाले रिजल्ट का कोई न कोई टॉपर होता है। पर अक्सर देखने में यह आता है कि एक ही टॉपर को बहुत से कोचिंग संस्थान अपने विज्ञापनों में सबसे ऊपर जगह देकर यह जताना चाहते हैं जैसे उनको सफलता उनकी मेहनत और लगन के चलते नहीं, बल्कि इन कोचिंग संस्थानों के चलते मिली है। चूंकि नीट और जेईई मेन और जेईई एडवांस्ड में सफलता कॅरियर को नई उंचाइयों और दिशा देने वाली परीक्षाएं मानी जाती हैं, इसलिए इनके टॉपरों को अपने विद्यार्थी के तौर पर दिखानें में कोई कोचिंग की दुकान वाला पीछे नहीं रहना चाहता है। भारत जैसे देश में जहां शिक्षा तेजी से व्यवसाय का रूप लेती जा रही है, वहां यह प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है।
जानें कितनी बार हुआ नीट पेपर लीक
अमुक कोचिंग संस्थान श्योर शॉट सफलता दिलाने के साथ ही टॉपर भी बनाता है, ऐसा कोचिंग बाजार का हर खिलाड़ी दिखाने की कोशिश करता है। नीट एग्जाम में सफलता किसी अन्य प्रतियोगी परीक्षा के बजाय कॅरियर चमकाने के नजरिए से अधिक अहम मानी जाती है। इसलिए इसके अधिक से अधिक टॉपरों की सफलता का श्रेय कोचिंग संस्थान लेने की गलाकाट प्रतियाोगिता का हिस्सा बनते हैं, क्योंकि टॉपरों के नाम के बल पर वे अधिक से अधिक छात्रों को अपने कोचिंग में प्रवेश देकर अधिक से अधिक पैसे कमाना चाहते हैं। आखिर कोचिंग भी तो एक व्यवसाय ही है, जिसका एक मात्र मकसद मुनाफा कमाना ही है। कॅरियर्स360 की पड़ताल में इस बाजार के हर राज से पर्दा हटेगा।
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राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) ने 21 जून 2026 को आयोजित री-नीट 2026 परीक्षा का रिजल्ट 16 जुलाई 2026 को घोषित किया। इसके तुरंत बाद कई कोचिंग संस्थानों ने टॉप रैंक हासिल करने वाले छात्रों को लेकर प्रचार अभियान शुरू कर दिए। उल्लेखनीय है कि 3 मई 2026 को आयोजित मूल नीट 2026 परीक्षा पेपर लीक के आरोपों के बाद रद्द कर दी गई थी और बाद में री-नीट आयोजित किया गया। री-नीट 2026 के नतीजे जारी होने के बाद एक बार फिर देश के कोचिंग उद्योग में 'टॉपर मार्केटिंग' को लेकर बहस तेज हो गई है। कोई उसे अपना क्लासरूम छात्र बताता है तो कोई ऑनलाइन बैच, डीएलपी (डिस्टेंस लर्निंग प्रोग्राम) या टेस्ट सीरीज़ का विद्यार्थी बताकर अपनी सफलता का श्रेय लेने की कोशिश करता है।
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इसी पूरे घटनाक्रम की पड़ताल Careers360 की एक जांच में की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, कई संस्थान केवल ऑनलाइन कोर्स या टेस्ट सीरीज़ से जुड़े छात्रों को भी अपने प्रमुख टॉपर्स के रूप में प्रचारित करते हैं। जांच में यह भी सामने आया कि कई मामलों में आधिकारिक रिजल्ट घोषित होने से पहले ही संभावित टॉपर्स से संपर्क शुरू हो जाता है।
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Careers360 के पड़ताल वाले वीडियो में री-नीट 2026 के AIR 1 आर्यन गुप्ता, AIR 2 पांशुल बंसल, AIR 3 उपलक्ष्य गोयल, AIR 4 आयुष भलोटिया, AIR 5 कुडाले श्रावणी कृष्णा, AIR 6 रिया रंजन, AIR 7 आर्यन दुबे, AIR 8 गीतांश सरीन, AIR 9 गौरव सिंह और AIR 10 मोहनीश मारुति भोसले के बारे में बताया गया है। इसमें कोचिंग संस्थानों की भूमिका का भी विश्लेषण करते हैं, जिसमें एलन, आकाश, एजुकेशन स्क्वायर, सक्सेस कोड कोचिंग इंस्टीट्यूट, संजय घोडावत IIT और मेडिकल एकेडमी, और बिना कोचिंग वाले उम्मीदवार भी शामिल हैं। इसके अलावा, कोचिंग संस्थानों के दावों और उम्मीदवारों की सहमति से जुड़े विवाद पर भी चर्चा की गई है।
Careers360 की जांच में पता चला कि कुछ कोचिंग संस्थान दलाल की भूमिका निभाने से भी गुरेज नहीं करते और विशेष रैंक वाले अभ्यर्थियों अथवा टॉपर को अपना बताने के लिए अभ्यर्थियों को लालच और प्रलोभन देने से भी पीछे नहीं हटते। लालच भी इतना बड़ा दिया जाता है कि अभ्यर्थी उसे चाहकर भी नकार नहीं पाते हैं। ऐसे में कुछ टॉपर्स अपने आपको इन संस्थानों से जुड़े होने की बात कहते नजर आ जाते हैं। समस्या की एक प्रमुख वजह यह भी है, जिसका नतीजा यह होता है कि सफलता पाने के लालच में अन्य इच्छुक अभ्यर्थी कोचिंग संस्थानों में एडमिशन ले लेते हैं, और यह सब कवायद भी कोचिंग संस्थानों द्वारा इसी लिए की जाती है ताकि अधिक से अधिक शिकार इनके जाल में फंस जाएं। इसी तरह अपने बच्चों का भविष्य उज्ज्वल बनाने का सपना संजोए अभिभावक भी इन संस्थानों की चाल का शिकार बन जाते हैं।
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विवरण | जानकारी |
परीक्षा | री-नीट 2026 |
परीक्षा आयोजित | 21 जून 2026 |
रिजल्ट घोषित | 16 जुलाई 2026 |
जांच करने वाला संस्थान | Careers360 |
मुख्य मुद्दा | एक ही टॉपर पर कई कोचिंग संस्थानों का दावा |
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Careers360 की जांच के अनुसार, टॉपर्स पर दावा करने की होड़ परिणाम घोषित होने के बाद नहीं बल्कि उससे पहले ही शुरू हो जाती है। रिपोर्ट के मुताबिक, आधिकारिक परिणाम आने से पहले कई संभावित री-नीट टॉपर्स से बातचीत की गई। इस दौरान कुछ छात्रों और उनके अभिभावकों ने बताया कि उन्हें पहले ही विभिन्न कोचिंग संस्थानों, पीआर एजेंसियों और उनके प्रतिनिधियों की ओर से फोन और संदेश आने लगे थे। इन संपर्कों का उद्देश्य संभावित टॉपर्स के साथ प्रचार संबंधी समझौते करना था ताकि परिणाम आते ही उनका इस्तेमाल विज्ञापनों में किया जा सके।

जांच के दौरान Careers360 ने परिणाम से पहले छात्रों से उनकी तैयारी और कोचिंग संस्थान के बारे में जानकारी ली। बाद में परिणाम घोषित होने के बाद इन इंटरव्यू की तुलना विभिन्न कोचिंग संस्थानों के विज्ञापनों से की गई। कई मामलों में ऐसे छात्र, जिन्होंने पहले किसी एक संस्थान से क्लासरूम कोचिंग लेने की बात कही थी, बाद में कई संस्थानों के प्रचार अभियानों में दिखाई दिए। रिपोर्ट के अनुसार, इनमें से अधिकांश अतिरिक्त दावे उन छात्रों से जुड़े थे जिन्होंने DLP, ऑनलाइन कोर्स या टेस्ट सीरीज़ जैसी सेवाओं का भी उपयोग किया था।

Careers360 के अनुसार, रिजल्ट घोषित होने से पहले दिए गए इंटरव्यू में AIR 1 आर्यन गुप्ता ने बताया था कि उनकी क्लासरूम कोचिंग एजुकेशन स्क्वायर से हुई थी। हालांकि, परिणाम आने के बाद उनका नाम कई अन्य कोचिंग संस्थानों के प्रचार अभियानों में भी दिखाई दिया, जहां DLP और अन्य कार्यक्रमों के आधार पर दावा किया गया। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि कई अन्य उच्च रैंक प्राप्त छात्रों पर भी एक से अधिक संस्थानों ने दावा किया। वहीं AIR 6 रिया रंजन पर किसी भी कोचिंग संस्थान ने दावा नहीं किया। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि हर टॉपर प्रचार अभियान का हिस्सा नहीं बनता।

कई बार अभिभावक और छात्र इन दोनों व्यवस्थाओं को एक जैसा समझ लेते हैं, जबकि वास्तविकता अलग है।
क्लासरूम कोचिंग | DLP (डिस्टेंस लर्निंग प्रोग्राम) |
नियमित ऑफलाइन कक्षाएं | अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराई जाती है |
शिक्षकों से सीधा मार्गदर्शन | ऑनलाइन लेक्चर मिलते हैं |
डाउट सेशन और निरंतर मेंटरिंग | मॉक टेस्ट और प्रैक्टिस पेपर |
निर्धारित अकादमिक शेड्यूल | नियमित ऑफलाइन कक्षाएं नहीं |
रिपोर्ट के अनुसार, कई विज्ञापनों में यह अंतर स्पष्ट नहीं बताया जाता। इससे यह धारणा बन जाती है कि छात्र ने उसी संस्थान से पूर्णकालिक क्लासरूम कोचिंग की थी, जबकि उसने केवल टेस्ट सीरीज़ या अध्ययन सामग्री का उपयोग किया हो सकता है।
Careers360 की जांच के दौरान मिला नीचे दिया गया स्क्रीनशॉट, प्रमोशन के मकसद से संपर्क करने की कोशिश कर रहे एक कैंडिडेट को भेजे गए ऐसे ही एक मैसेज को दिखाता है।
आज अधिकांश छात्र अपनी तैयारी के दौरान एक से अधिक संसाधनों का उपयोग करते हैं। उदाहरण के तौर पर कोई छात्र नियमित क्लासरूम कोचिंग एक संस्थान से करता है, जबकि किसी दूसरे संस्थान से ऑनलाइन बैच, DLP, प्रश्न बैंक या टेस्ट सीरीज़ खरीद लेता है। परिणाम आने के बाद जिन-जिन संस्थानों से छात्र किसी भी रूप में जुड़ा होता है, वे उसे अपने प्रचार अभियान में शामिल कर लेते हैं। कुछ संस्थान यह स्पष्ट लिखते हैं कि छात्र ने कौन-सा कार्यक्रम किया था, लेकिन कई विज्ञापनों में यह जानकारी नहीं दी जाती। इससे छात्रों और अभिभावकों के लिए वास्तविक तैयारी का स्रोत समझना कठिन हो जाता है।
Careers360 की जांच के अनुसार, कई बार शिक्षकों के एक संस्थान से दूसरे संस्थान में जाने के कारण भी टॉपर दावों को लेकर भ्रम पैदा होता है। संभव है कि किसी शिक्षक ने छात्र को तैयारी के अंतिम चरण में मार्गदर्शन दिया हो, जबकि उसकी अधिकांश तैयारी किसी अन्य संस्थान में हुई हो। यदि छात्र शीर्ष रैंक हासिल करता है, तो शिक्षक जिस संस्थान में वर्तमान में कार्यरत होता है, वह भी छात्र को अपने प्रचार में शामिल कर सकता है। ऐसी स्थिति में अभिभावकों के लिए यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि छात्र की सफलता में सबसे बड़ी भूमिका किस संस्थान की रही।
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Careers360 की रिपोर्ट का मुख्य सवाल यह है कि क्या री-नीट की तैयारी कर रहे छात्रों और उनके अभिभावकों को पूरी और पारदर्शी जानकारी मिल रही है? रिपोर्ट के अनुसार, कोचिंग संस्थानों को यह स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि संबंधित छात्र उनके यहां क्लासरूम प्रोग्राम, DLP, ऑनलाइन बैच या केवल टेस्ट सीरीज़ से जुड़ा था। इससे भ्रामक प्रचार पर रोक लगेगी और अभ्यर्थी सही जानकारी के आधार पर निर्णय ले सकेंगे। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाए बिना हर वर्ष टॉपर्स को लेकर ऐसे विवाद और भ्रम दोहराए जाते रहेंगे।
कोचिंग बाजार का स्याह पहलू भी है जिस ओर बहुत कम लोग ध्यान देते हैं। हर वर्ष तय एमबीबीएस सीटों पर ही छात्रों को प्रवेश मिलना होता है क्योंकि एमबीबीएस की कुल सीट से अधिक छात्रों को प्रवेश दिया नहीं जा सकता है। ऐसे में चाहे कोचिंग में जितने अधिक बच्चे जाएं प्रवेश पाने वालों के लिए हर संस्थान में सीटें तो पहले से तय हैं। इसका अर्थ है कि 823 मेडिकल कॉलेजों की 1,36,939 एमबीबीएस सीटों पर ही प्रवेश दिए जाएंगे जबकि परीक्षा के लिए पंजीकृत 2279743 आवेदकों में से 1999895 ने ही भाग लिया था और इनमें से भी नीट में सफल तो 1121185 उम्मीदवार ही घोषित किए गए हैं। सीटों की संख्या तो 1,36,939 ही है ऐसे में शेष सफल 984,246 छात्रों को तो सीट मिलने से रही। कुल मिलाकर परीक्षा में भाग लेने वाले 1,862,956 उम्मीदवार एमबीबीएस सीट नहीं होगी। इनमें उम्मीदवारों के बड़े हिस्से ने निश्चित तौर पर कोचिंग ली होगी पर उनकी असफलता की जिम्मेदारी किसकी बनती है? मीठा-मीठा गप और तीता-तीता थू। वाली कहावत यहां चरितार्थ होती है। उंगलियों पर गिने जा सकने वाले टॉपर बनाने का दावा करने वाले कोचिंग संस्थानों को इससे जुडे़ आंकड़े भी साझे करने चाहिए कि उनके कितने छात्र परीक्षा में असफल रहे।
लेकिन ऐसा करते ही उनकी पोल खुल जाएगी इसलिए रीढ़विहीन कोचिंग बाजार से ऐसी कोई उम्मीद करनी बेमानी होगा। रिया रंजन जैसे उदाहरण भी हैं जो यह बताने के लिए काफी हैं कि जहां स्वाध्याय के जरिए भी मुश्किल परीक्षाओं को क्रैक किया जा सकता है वहीं टॉपर तैयार करने का दावा करने वालों के यहां कोचिंग लेने वालों के भी हाथ खाली रह जाते हैं। असली अंतर लगन के साथ सही ढंग से तैयारी करने का ही होता है। यहां यह तथ्य भी ध्यान में रखना होगा कि निर्धारित सीटों से अधिक उम्मीदवारों को प्रवेश नहीं मिल पाएगा। ऐसे में दूसरों तुलनात्मक रूप से बेहतर प्रदर्शन का पहलू निर्णायक हो जाता है।
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