SRM Kattankulathur Dental College and Hospital, Kattankulathur
Ranked #19 by NIRF, NAAC A++ Accredited | Recognized by dental council of India
हर बार जब सरकार भारत में एमबीबीएस सीटों की संख्या बढ़ाने की घोषणा करती है, तो यह छात्रों के लिए अच्छी खबर लगती है। हालांकि,एनएमसी एमबीबीएस सीट मैट्रिक्स 2026 और पिछले दो वर्षों के आंकड़ों पर करीब से नजर डालने पर एक चिंताजनक तस्वीर सामने आती है। एमबीबीएस सीटों में अधिकांश बढ़ोतरी सरकारी मेडिकल कॉलेजों के बजाय निजी मेडिकल कॉलेजों में हो रही है, जबकि सरकारी कॉलेजों की फीस अपेक्षाकृत कम और अधिकांश छात्रों की पहुंच में होती है।
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इसका सीधा असर इस बात पर पड़ता है कि भारत में वास्तव में डॉक्टर बनने का अवसर किसे मिल पाता है। सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेज की एमबीबीएस सीट के बीच अंतर केवल सीट के प्रकार का नहीं है, बल्कि इसमें फीस, आर्थिक पहुंच और सामाजिक अवसरों का भी बड़ा अंतर शामिल है।
सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस सीटों के बीच अंतर केवल सीटों की संख्या का नहीं, बल्कि उनकी लागत और छात्रों की पहुंच का भी है। एक सरकारी मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने में लगभग 10 लाख रुपये तक का खर्च हो सकता है। वहीं, एक निजी मेडिकल कॉलेज में यही डिग्री पूरी करने का खर्च करीब 1.5 करोड़ से 2 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
फीस में यह भारी अंतर तय करता है कि निजी मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई का खर्च कौन उठा सकता है। भारत की आबादी का केवल एक छोटा वर्ग (लगभग 1 प्रतिशत) ही इतनी महंगी मेडिकल शिक्षा का खर्च वहन करने की स्थिति में है। ऐसे में, जब नई एमबीबीएस सीटों में अधिकांश बढ़ोतरी निजी मेडिकल कॉलेजों में होती है, तो मेडिकल शिक्षा की कुल क्षमता बढ़ने के बावजूद इसका लाभ निम्न और मध्यम आय वर्ग के छात्रों तक समान रूप से नहीं पहुंच पाता।
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एमबीबीएस सीट मैट्रिक्स 2024 से 2026: पूरा वीडियो विश्लेषण
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1 फरवरी 2025 को पेश किए गए केंद्रीय बजट 2025-26 में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अगले एक वर्ष में 10,000 अतिरिक्त मेडिकल सीटें बढ़ाने की योजना की घोषणा की थी। यह घोषणा अगले पांच वर्षों में देशभर में 75,000 मेडिकल सीटें बढ़ाने के व्यापक लक्ष्य का हिस्सा थी।
हालांकि, सरकार की इस घोषणा में यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि इन अतिरिक्त सीटों में से कितनी सीटें सरकारी मेडिकल कॉलेजों में बढ़ाई जाएंगी और कितनी सीटें निजी मेडिकल कॉलेजों के माध्यम से जोड़ी जाएंगी।
इसी सवाल का जवाब जानने के लिए Careers360 ने वर्ष 2024 और 2026 के उपलब्ध एमबीबीएस सीट आंकड़ों की तुलना की। इस विश्लेषण का उद्देश्य यह समझना था कि पिछले दो वर्षों के दौरान एमबीबीएस सीटों का विस्तार वास्तव में किन संस्थानों में हुआ है—सरकारी मेडिकल कॉलेजों में या निजी मेडिकल कॉलेजों में।
वर्ष | सरकारी एमबीबीएस सीटें | निजी/डीम्ड एमबीबीएस सीटें | कुल एमबीबीएस सीटें |
2024 | 60,485 | 57,265 | 1,17,750 |
2025 | 63,682 | 65,193 | 1,28,875 |
2026 | 66,046 | 73,643 | 1,39,689 |
2024 से 2026 तक बढ़ोतरी | 5,561 | 16,378 | 21,939 |
प्रतिशत वृद्धि | 9.19% | 28.60% | 18.63% |
आंकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2024 से 2026 के बीच भारत में जोड़ी गई 21,939 अतिरिक्त एमबीबीएस सीटों में से लगभग 16,378 सीटें निजी और डीम्ड मेडिकल कॉलेजों में बढ़ीं, जबकि सरकारी मेडिकल कॉलेजों में केवल 5,561 नई सीटें जोड़ी गईं।
इस अवधि में सरकारी मेडिकल कॉलेजों की एमबीबीएस सीटों में 9.19% की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि निजी/डीम्ड मेडिकल कॉलेजों की सीटों में 28.6% की बढ़ोतरी हुई। यानी निजी क्षेत्र में एमबीबीएस सीटों की वृद्धि दर सरकारी मेडिकल कॉलेजों की तुलना में लगभग 3.1 गुना अधिक रही।
लेकिन यह तस्वीर यहीं खत्म नहीं होती। राज्य स्तर पर स्थिति और भी अधिक स्पष्ट और चिंताजनक नजर आती है।
राष्ट्रीय स्तर के आंकड़ों की तरह राज्य स्तर पर भी एमबीबीएस सीटों में बढ़ोतरी का रुझान निजी मेडिकल कॉलेजों के पक्ष में अधिक दिखाई देता है। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, राजस्थान, केरल और उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में वर्ष 2024 से 2026 के बीच निजी मेडिकल कॉलेजों में सीटों की वृद्धि सरकारी मेडिकल कॉलेजों की तुलना में कई गुना अधिक रही।
राज्य | 2026 सरकारी सीटें | 2026 निजी सीटें | 2024 सरकारी सीटें | 2024 निजी सीटें | सरकारी सीटों में वृद्धि | निजी सीटों में वृद्धि | निजी/सरकारी वृद्धि अनुपात |
महाराष्ट्र | 6,125 | 7,099 | 6,025 | 5,820 | 100 | 1,279 | 12.79 गुना |
तमिलनाडु | 5,399 | 8,650 | 5,250 | 6,800 | 149 | 1,850 | 12.42 गुना |
राजस्थान | 4,630 | 3,600 | 4,455 | 2,050 | 175 | 1,550 | 8.86 गुना |
केरल | 1,855 | 3,849 | 1,755 | 3,000 | 100 | 849 | 8.49 गुना |
उत्तर प्रदेश | 5,950 | 8,300 | 5,725 | 6,750 | 225 | 1,550 | 6.89 गुना |
गुजरात | 4,325 | 3,500 | 4,250 | 3,000 | 75 | 500 | 6.67 गुना |
तेलंगाना | 4,500 | 5,850 | 4,315 | 4,750 | 185 | 1,100 | 5.95 गुना |
बिहार | 1,835 | 2,450 | 1,645 | 1,350 | 190 | 1,100 | 5.79 गुना |
कर्नाटक | 4,400 | 10,995 | 3,800 | 8,595 | 600 | 2,400 | 4.00 गुना |
महाराष्ट्र: वर्ष 2024 से 2026 के बीच सरकारी एमबीबीएस सीटों में केवल 100 की बढ़ोतरी हुई, जो 6,025 से बढ़कर 6,125 हो गईं। इसके विपरीत, निजी एमबीबीएस सीटों में 1,279 की वृद्धि हुई और इनकी संख्या 5,820 से बढ़कर 7,099 पहुंच गई। यानी निजी सीटों में बढ़ोतरी सरकारी सीटों की तुलना में लगभग 13 गुना अधिक रही।
तमिलनाडु: सरकारी एमबीबीएस सीटों में 149 की वृद्धि हुई, जबकि निजी सीटों में 1,850 सीटें बढ़ीं। सरकारी सीटें 5,250 से बढ़कर 5,399 हुईं, जबकि निजी सीटों की संख्या 6,800 से बढ़कर 8,650 पहुंच गई। यहां निजी सीटों की वृद्धि सरकारी सीटों की तुलना में लगभग 12 गुना अधिक रही।
राजस्थान: सरकारी एमबीबीएस सीटों में अपेक्षाकृत सीमित वृद्धि हुई, जबकि निजी क्षेत्र में सीटों का विस्तार काफी तेज रहा। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, सरकारी सीटों में 175 की वृद्धि के मुकाबले निजी सीटों में 1,150 से अधिक सीटें बढ़ीं।
केरल: सरकारी सीटों में केवल 100 की वृद्धि हुई, जबकि निजी मेडिकल कॉलेजों में 849 अतिरिक्त सीटें जोड़ी गईं। यानी निजी क्षेत्र में सीटों की बढ़ोतरी सरकारी कॉलेजों की तुलना में लगभग 8 गुना अधिक रही।
गुजरात: सरकारी एमबीबीएस सीटों में केवल 75 सीटों की वृद्धि हुई, जबकि निजी सीटों में 500 सीटें बढ़ीं।
उत्तर प्रदेश: सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 225 अतिरिक्त एमबीबीएस सीटें जुड़ीं, जबकि निजी कॉलेजों में 1,550 सीटों की वृद्धि हुई।
तेलंगाना: सरकारी सीटों में 185 की बढ़ोतरी हुई, जबकि निजी एमबीबीएस सीटों में 1,100 सीटें जोड़ी गईं।
बिहार: सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 190 अतिरिक्त सीटों की तुलना में निजी कॉलेजों में 1,100 नई एमबीबीएस सीटें बढ़ीं।
महाराष्ट्र, तमिलनाडु, राजस्थान, केरल, उत्तर प्रदेश, गुजरात, तेलंगाना और बिहार जैसे बड़े राज्यों में निजी एमबीबीएस सीटों की वृद्धि सरकारी सीटों की तुलना में लगभग 5 से 13 गुना अधिक रही। यह पैटर्न दिखाता है कि मेडिकल शिक्षा के विस्तार में निजी क्षेत्र की भूमिका तेजी से बढ़ रही है।
सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीटें बढ़ाने के लिए सरकार को वास्तविक सार्वजनिक निवेश करना पड़ता है। इसके लिए नए मेडिकल कॉलेज और अस्पताल, पर्याप्त बुनियादी ढांचा, फैकल्टी, क्लिनिकल सुविधाएं और लंबे समय तक वित्तीय निवेश की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत, निजी मेडिकल कॉलेजों में सीटें बढ़ाने के लिए मुख्य रूप से नए कॉलेजों की स्थापना या मौजूदा संस्थानों के विस्तार को मंजूरी देना आवश्यक होता है।
सरकारी मेडिकल कॉलेजों की क्षमता बढ़ाने की प्रक्रिया भी नियामकीय और प्रशासनिक चुनौतियों से जुड़ी रही है। सीटों में बढ़ोतरी या नए मेडिकल कॉलेजों को मंजूरी देने की प्रक्रिया को लेकर समय-समय पर विवाद और पारदर्शिता से जुड़े सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में यह व्यवस्था हमेशा उन राज्यों के पक्ष में काम करती हुई नहीं दिखती, जो अपनी सार्वजनिक मेडिकल शिक्षा क्षमता का विस्तार करना चाहते हैं।
एक उदाहरण तमिलनाडु का है। राज्य सरकार ने सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस सीटें बढ़ाने की अनुमति मांगी थी, लेकिन केंद्र सरकार ने यह कहते हुए अनुमति देने से इनकार कर दिया कि राज्य में डॉक्टर-आबादी अनुपात पहले से पर्याप्त है।
दिलचस्प बात यह है कि इसी दौरान निजी मेडिकल संस्थानों को अपनी क्षमता बढ़ाने और सीटों में विस्तार के लिए मंजूरी मिलती रही। इससे यह सवाल उठता है कि यदि किसी राज्य में सरकारी मेडिकल शिक्षा के विस्तार को डॉक्टर-आबादी अनुपात जैसे मानदंडों के आधार पर सीमित किया जा सकता है, तो निजी मेडिकल कॉलेजों के विस्तार के लिए अपनाए जाने वाले मानदंड कितने अलग या समान हैं।
इन सभी आंकड़ों को एक साथ देखने पर एक स्पष्ट तस्वीर सामने आती है। राष्ट्रीय स्तर पर निजी और डीम्ड मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस सीटों की वृद्धि सरकारी मेडिकल कॉलेजों की तुलना में लगभग तीन गुना तेज रही है। वहीं, कई राज्यों में निजी सीटों की वृद्धि सरकारी सीटों की तुलना में इससे भी कहीं अधिक दर्ज की गई है।
निजी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस की पढ़ाई की लागत अधिकांश भारतीय परिवारों की आर्थिक पहुंच से काफी बाहर है। ऐसे में, यदि मेडिकल सीटों का अधिकांश विस्तार निजी क्षेत्र में होता रहा, तो इसका खतरा है कि मेडिकल शिक्षा धीरे-धीरे समाज के आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग तक अधिक सीमित होती जाएगी।
एक देश के रूप में भारत के सामने एक बुनियादी सवाल है—क्या देश में एमबीबीएस सीटों का विस्तार इस तरह हो रहा है कि मेडिकल पेशे में प्रवेश का अवसर हर वर्ग के भारतीय छात्र के लिए वास्तव में बढ़े? या फिर मेडिकल शिक्षा तक पहुंच मुख्य रूप से समाज के सबसे समृद्ध वर्ग, यानी शीर्ष 1% तक ही सीमित होती जा रही है?
इसलिए नीट [NEET] के उम्मीदवारों के लिए भारत में बढ़ती एमबीबीएस सीटों का आंकड़ा पूरी तस्वीर नहीं बताता। सीटों की संख्या बढ़ना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी यह देखना है कि नई सीटें कहां जोड़ी जा रही हैं, उनकी फीस कितनी है और अलग-अलग आर्थिक पृष्ठभूमि वाले छात्रों के लिए वे कितनी सुलभ हैं?
On Question asked by student community
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